आज बिहार के समाचार पत्रों की मुख्य पृष्ठ पर एक दर्दनाक खबर छपी कि एक दुर्घटना के बाद क्रुद्ध भीड़ ने ढेड दर्जन वाहनों को फूंक दिया . ये वे वाहन थे जिनका दुर्घटना से कोई वास्ता नहीं था .वहां एक वाहन दुर्घटना में चार लोगों की मौत हुइ थी जिसके विरोध में भीड ने यह तांडव किया. क्या यह भीड तंत्र का आतंकवाद नहीं ? किसी आतंकवादी कारवाई से कम है इतने वाहनों को एक साथ जाला देना और क्या किसी भीड़ को यह इजाजत दी जा सकती है कि वह सड़को पर जो चाहे , करे .
मेरी राय है कि इस तरह का भीड़ तंत्र देश के लिए एक नए खतरे के रूप में विकसित हो रहा है . बिहार के पूर्व डी.जी. पी. डी .एन .गौतम को याद करना चाहूँगा जिन्होंने कहा था भीड़ तंत्र आंतंकवाद से भी ज्यादा घातक है. भीड़ कही थाने को जला दे रही है तो कही किसी घटना के बाद राजमार्ग को जाम कर वाहनों को फूंकने लगती है . मैं किसी अपराध में कठोरतम सजा का पक्षधर नहीं हूँ लेकिन सड़क को जाम कर वाहन फूंकने की घटना को सबसे संगीन अपराध मानता हूँ . आई पी सी में ऐसी घटनाओ को हत्या से भी ज्यादा संगीन अपराध माना जाना चाहिए . सड़क को रोकना राष्ट्र को रोकने के समान है .आश्चर्य तो यह ऐसी घटनाओ पर पुलिस अज्ञात भीड़ पर मुक़दमा दायर कर खामोश हो जाती है .
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