Monday, 3 October 2011

आखिर हम इतने कमजोर क्यूँ ?

सभी साथियों को दशहरे की शुभकामनाएं . पर एक सवाल भी . हमारे यहाँ शक्ति की उपासना सबसे ज्यादा होती है लेकिन शारीरिक तौर पर हम उतने ही कमजोर और पीले . सरस्वती की उपासना भी हर गली मोहल्ले में , पर निरक्षरता का अभिशाप भी हमारे ही साथ . आखिर क्यों ? क्या इसलिए नहीं कि हम उपासना के मूल मकसद से भटक गए है. पूजा ही काफी  नहीं होती .  उसके मर्म को समझने और सन्देश  को जीवन में उतरा जाना भी जरुरी है . दशहरे का सन्देश तो यही है न कि हम बुराइयों पर चोट करें और अच्छाइयों को जीवन में उतारे . क्या ऐसा हो रहा है ? जवाब नकारात्मक होगा . हम अगर सत्य के रास्ते पर चलते तो समाज और सत्ता में इतनी बुराइयाँ नहीं होती . आश्चर्य तो यह कि अच्छाई भी बुराई का  साथ देने लगी है . जब अच्छाई बुराई की हिफाजत में सामने आती है तो वही पे ट्रेजडी पैदा होती है . आज बड़ी हस्तियाँ कमजोरों को कुचल रही है . गरीबो के जीने के अधिकार पर सवाल खड़ा  होता जा रहा है . लोग गीता और कुरान की  कसमें  खा कर भी अपने लाभ के लिए और  यहाँ तक कि अब  अदालतों  में भी झूठ बोलने लगे हैं  . फिर भी हम निराश नहीं , निराशा  के कोहरे  में ही आशा  के आलोक  का गीत बजता  है .  इस  दशहरे से हम यह उम्मीद  करें कि देवी  की  आराधना  से हमारे भीतर  वह ताकत  पैदा हो जो  समाज और सत्ता की  बुरी ताकतों  से लड़ सके .

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