सभी साथियों को दशहरे की शुभकामनाएं . पर एक सवाल भी . हमारे यहाँ शक्ति की उपासना सबसे ज्यादा होती है लेकिन शारीरिक तौर पर हम उतने ही कमजोर और पीले . सरस्वती की उपासना भी हर गली मोहल्ले में , पर निरक्षरता का अभिशाप भी हमारे ही साथ . आखिर क्यों ? क्या इसलिए नहीं कि हम उपासना के मूल मकसद से भटक गए है. पूजा ही काफी नहीं होती . उसके मर्म को समझने और सन्देश को जीवन में उतरा जाना भी जरुरी है . दशहरे का सन्देश तो यही है न कि हम बुराइयों पर चोट करें और अच्छाइयों को जीवन में उतारे . क्या ऐसा हो रहा है ? जवाब नकारात्मक होगा . हम अगर सत्य के रास्ते पर चलते तो समाज और सत्ता में इतनी बुराइयाँ नहीं होती . आश्चर्य तो यह कि अच्छाई भी बुराई का साथ देने लगी है . जब अच्छाई बुराई की हिफाजत में सामने आती है तो वही पे ट्रेजडी पैदा होती है . आज बड़ी हस्तियाँ कमजोरों को कुचल रही है . गरीबो के जीने के अधिकार पर सवाल खड़ा होता जा रहा है . लोग गीता और कुरान की कसमें खा कर भी अपने लाभ के लिए और यहाँ तक कि अब अदालतों में भी झूठ बोलने लगे हैं . फिर भी हम निराश नहीं , निराशा के कोहरे में ही आशा के आलोक का गीत बजता है . इस दशहरे से हम यह उम्मीद करें कि देवी की आराधना से हमारे भीतर वह ताकत पैदा हो जो समाज और सत्ता की बुरी ताकतों से लड़ सके .
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