आज हिंदी दिवस मना, मनाया गया. सब कुछ औपचारिकता जैसा ही लगा. मन में एक सवाल भी उठता रहा , अपनी हिंदी को इतना दरिद्र क्यों समझा जा रहा है कि उसमे बड़े पैमाने पर अंग्रजी शब्दों की मिलावट की जाने लगी है.
शायद यह प्रचलन है या अतिशय बौद्धिकता का नासमझ प्रमाण पत्र. या दोनों ?
मेरी समझ है कि जो भी ऐसा कर रहे है , वे किसी दिशाहारा बटोही की तरह अपनी नासमझी को ही अपनी उपलब्धि मान बैठे है.
बेशक, हिंदी अपनों से ही हार रही है, पर दूसरी तरफ बाज़ार की अनिवार्यता भी बन गयी है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट जगत के उत्पाद का हिंदी भाषी क्षेत्र ही बड़ा बाज़ार है.
गौर करे, हिंदी भाषी क्षेत्र का लगभग प्रत्येक प्रमंडल बड़े हिंदी समाचार पत्रों की प्रकाशन इकाई बन रहा है.
वहाँ से अनेक संस्करण निकलने लगे है. अच्छी आय हो रही है. लेकिन , दुःख यह कि वे ही आज हिंदी भाषा के साथ ज्यादा छेड़छाड़ कर रहे है.
खबरों और आलेखों में हिंदी के साथ अंगरेजी शब्दों के बेमेल सम्बन्ध को बढ़ावा देना उनकी कोई भविष्य की कारोबारी योजना हो सकती है, पर जरा सोचे, जो हिंदी आपके खजाने को भर रही है, उसके साथ क्या नाइंसाफ़ी नहीं ?
यह मत भूलें , हिंदी गंगा है. आम आदमी की जुबान है. इसे धूमिल या गन्दा करने की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकती.
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