Monday, 12 September 2011

सांप्रदायिक हिंसा विधेयक



राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक में सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर सहमति नहीं बनीबननी भी नहीं  चाहिएसोचता हूँ , आखिर केंद्र सरकार इसे पारित करने की जल्दबाजी में क्यों हैक्या पहले के  कानून इतने कमज़ोर हैं कि एक ऐसा विधेयक लाने की तैयारी चल रही है जिससे देश के संघीय ढाँचें के टूट कर बिखर जाने का भी खतरा उत्पन्न हो सकता है.

अपराध करनेवालों की कोई जाति या मज़हब नहीं होता. फिर, यह मान कर कैसे चला जा सकता है कि सांप्रदायिक हिंसा के लिए केवल बहुसंख्यक समुदाय ही दोषी होगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस विचार से सहमत हूँ कि बिल के कुछ प्रावधानों से जनमानस में ऐसी धारण  बन सकती है कि बहुसंख्यक समुदाय ही सांप्रदायिक घटनाओ के लिए हमेशा दोषी होता है.

आखिर कितने कानूनों का बोझ ढोएगा यह भारतीए समाज.
सदियों से कठोरतम  दंड बिधान है पर क्या अपराध रुके ? हिंसा रुकी ? ऐसा क्या इसीलिए नहीं कि हमने क्षमा करनी छोड़ दी . दंड जब चूक जाये तो क्षमा का विकल्प ही विकसित किया जाना चाहिए.
अपराध, नफरत और हिंसा मानसिक विकृति है. सजा तन को मिलती है, मन को नहीं. मन में इतना प्यार , स्नेह , सद्भाव और करुणा भरिये कि वह कभी अपराध की सोच भी सके . सत्ता हिंसा को केवल तन से जोड़  कर देखती रही है. इस बिल के मूल में भी आदमी का केवल तन ही है.
कोई तो शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो आदमी को इन्सान बना सके. इंसानों के समाज में
अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक जैसे सवाल नहीं होते. सिलेबस में फिर से नैतिक शिक्षा शामिल करे .



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