Saturday, 22 October 2011

भीड तंत्र का आतंकवाद


आज बिहार के समाचार पत्रों की मुख्य पृष्ठ पर एक दर्दनाक खबर छपी कि एक दुर्घटना के बाद क्रुद्ध भीड़  ने ढेड दर्जन वाहनों को फूंक  दिया . ये वे वाहन थे जिनका दुर्घटना से कोई वास्ता  नहीं था .वहां एक वाहन दुर्घटना में चार लोगों की मौत हुइ थी जिसके विरोध में भीड  ने यह तांडव किया. क्या यह भीड  तंत्र  का आतंकवाद नहीं ? किसी आतंकवादी कारवाई से कम है इतने वाहनों को एक साथ जाला देना और क्या किसी भीड़ को यह इजाजत दी जा सकती है कि वह सड़को पर जो चाहे , करे .
मेरी राय है कि इस तरह का भीड़ तंत्र देश के लिए एक नए खतरे के रूप में विकसित हो रहा है . बिहार के पूर्व डी.जी. पी. डी .एन .गौतम  को याद करना चाहूँगा जिन्होंने कहा था भीड़ तंत्र आंतंकवाद से भी ज्यादा घातक है. भीड़ कही थाने को जला दे रही है तो कही किसी घटना के बाद राजमार्ग को जाम कर वाहनों को फूंकने लगती है . मैं किसी अपराध में कठोरतम  सजा का पक्षधर नहीं हूँ  लेकिन सड़क को  जाम कर वाहन फूंकने की घटना को सबसे संगीन अपराध मानता  हूँ . आई पी सी में ऐसी घटनाओ को हत्या से भी ज्यादा संगीन अपराध माना जाना चाहिए . सड़क को रोकना राष्ट्र को रोकने के समान है .आश्चर्य तो यह ऐसी घटनाओ पर पुलिस अज्ञात भीड़ पर मुक़दमा दायर  कर खामोश हो जाती  है .

Monday, 3 October 2011

आखिर हम इतने कमजोर क्यूँ ?

सभी साथियों को दशहरे की शुभकामनाएं . पर एक सवाल भी . हमारे यहाँ शक्ति की उपासना सबसे ज्यादा होती है लेकिन शारीरिक तौर पर हम उतने ही कमजोर और पीले . सरस्वती की उपासना भी हर गली मोहल्ले में , पर निरक्षरता का अभिशाप भी हमारे ही साथ . आखिर क्यों ? क्या इसलिए नहीं कि हम उपासना के मूल मकसद से भटक गए है. पूजा ही काफी  नहीं होती .  उसके मर्म को समझने और सन्देश  को जीवन में उतरा जाना भी जरुरी है . दशहरे का सन्देश तो यही है न कि हम बुराइयों पर चोट करें और अच्छाइयों को जीवन में उतारे . क्या ऐसा हो रहा है ? जवाब नकारात्मक होगा . हम अगर सत्य के रास्ते पर चलते तो समाज और सत्ता में इतनी बुराइयाँ नहीं होती . आश्चर्य तो यह कि अच्छाई भी बुराई का  साथ देने लगी है . जब अच्छाई बुराई की हिफाजत में सामने आती है तो वही पे ट्रेजडी पैदा होती है . आज बड़ी हस्तियाँ कमजोरों को कुचल रही है . गरीबो के जीने के अधिकार पर सवाल खड़ा  होता जा रहा है . लोग गीता और कुरान की  कसमें  खा कर भी अपने लाभ के लिए और  यहाँ तक कि अब  अदालतों  में भी झूठ बोलने लगे हैं  . फिर भी हम निराश नहीं , निराशा  के कोहरे  में ही आशा  के आलोक  का गीत बजता  है .  इस  दशहरे से हम यह उम्मीद  करें कि देवी  की  आराधना  से हमारे भीतर  वह ताकत  पैदा हो जो  समाज और सत्ता की  बुरी ताकतों  से लड़ सके .